तमाशा ( THE PUPPET SHOW)
प्यार भरा नमस्कार दोस्तों,
आज टी.वी.पर यूँ ही अचानक बहुत दिन बाद ' कठपुतली' का नाच देखा तो ऐसा लगा मानो बचपन की यादों की संदूकची से कोई पुरानी ख़ूबसूरत सी मनपसन्द चीज हाथ लग गयी हो .
'कठपुतली ' कितनी मनोरंजक होती है ना ! पर शायद तब तक जब तक एक निर्जीव गुडिया है ...पर अगर वास्तविक दुनिया पर नज़र डालें तो पाएंगे की सजीव गुडिया भी हैं आस-पास .
बाबाजिओं के डेरों में , कॉर्पोरेट ऑफिस आदि में ....धर्मान्धता /अन्धविश्वास , नियमों के धागों से बंधी कठपुतलियां , घड़ी की सुइयों के इशारे पर नाचती कठपुतलियां , घर-परिवार की जरूरतों को पूरा करने में खटती कठपुतलियां , राजनीति के दाँव पेचों के धागों से लटकती , सरकार के नियमों पर कमर मटकाती , कूद-कूद कर हाथ नचा नचा कर उम्मीद के इशारों पर नाचती रंग-बिरंगी , सुंदर और शरारती भांति-भांति की कठपुतलियां ...दलों के सदस्यों के रूप में गुंडा-गर्दी का खेल दिखाती , ईश्वर के नाम पर कहानी गढ़ कर लोगों को गुमराह करती ...बेरोजगारी , अशिक्षा , अवसरों की कमी , निर्रथक पढाई के बोझ से दबी , समाज के जात-पात , आरक्षण और ऊँच-नीच के भेद-भाव का शिकार 'कठपुतलियां ' ...
ईमानदारी से सोचियेगा क्योंकि तभी आप अपने आस-पास या शायद अपने ही शरीर के इर्द-गिर्द धागों का खीचांव महसूस कर पाएंगे ...और शायद ये भी कि हम हर काम को पूरे मन , इच्छा या लगन से इन धागों के जाल के कारण नहीं कर पाते ..क्योंकि परमात्मा ने हमें उन्मुक्त,स्वछन्द ,स्वतंत्र और एक बुध्हिजिवी (सामाजिक) प्राणी बनाया था ......लेकिन सबसे पहले सभ्यता फिर संस्कृति और फिर संस्कार के धागे बनाये गए और फिर धर्म के नाम के कपड़ों से हम सजीव कठपुतलियों को सजाकर समाज नामक संस्था ने अपना शो तैयार किया , राजनीति ने कहानी गढ़ी और सरकार ने मंच सजाया .
और लीजिये साहब ! हम सब नाचना शुरू कर चुके हैं और एक के बाद एक अनवरत शो कर रहें हैं .
कभी मनोरंजक , कभी उबाऊ ,कभी घिनोनी , कभी मनभावन अलग-अलग प्रस्तुती पर बहुत ही कम हमारे मन की हैं ..होगी भी कैसेआखिर कहानीकार और निर्माता भी इसी व्यवस्था यानि इसी शो का हिस्सा हैं स्वतंत्र राय तो उनकी भी नहीं है ...
चलिए चलने देते हैं ...कुछ अलग की सम्भावना व्यर्थ है ...'तमाशा ' यूँ ही चलेगा
आज के लिए बस इतना ही...
अपना ध्यान रखियेगा ...
आज टी.वी.पर यूँ ही अचानक बहुत दिन बाद ' कठपुतली' का नाच देखा तो ऐसा लगा मानो बचपन की यादों की संदूकची से कोई पुरानी ख़ूबसूरत सी मनपसन्द चीज हाथ लग गयी हो .
'कठपुतली ' कितनी मनोरंजक होती है ना ! पर शायद तब तक जब तक एक निर्जीव गुडिया है ...पर अगर वास्तविक दुनिया पर नज़र डालें तो पाएंगे की सजीव गुडिया भी हैं आस-पास .
बाबाजिओं के डेरों में , कॉर्पोरेट ऑफिस आदि में ....धर्मान्धता /अन्धविश्वास , नियमों के धागों से बंधी कठपुतलियां , घड़ी की सुइयों के इशारे पर नाचती कठपुतलियां , घर-परिवार की जरूरतों को पूरा करने में खटती कठपुतलियां , राजनीति के दाँव पेचों के धागों से लटकती , सरकार के नियमों पर कमर मटकाती , कूद-कूद कर हाथ नचा नचा कर उम्मीद के इशारों पर नाचती रंग-बिरंगी , सुंदर और शरारती भांति-भांति की कठपुतलियां ...दलों के सदस्यों के रूप में गुंडा-गर्दी का खेल दिखाती , ईश्वर के नाम पर कहानी गढ़ कर लोगों को गुमराह करती ...बेरोजगारी , अशिक्षा , अवसरों की कमी , निर्रथक पढाई के बोझ से दबी , समाज के जात-पात , आरक्षण और ऊँच-नीच के भेद-भाव का शिकार 'कठपुतलियां ' ...
ईमानदारी से सोचियेगा क्योंकि तभी आप अपने आस-पास या शायद अपने ही शरीर के इर्द-गिर्द धागों का खीचांव महसूस कर पाएंगे ...और शायद ये भी कि हम हर काम को पूरे मन , इच्छा या लगन से इन धागों के जाल के कारण नहीं कर पाते ..क्योंकि परमात्मा ने हमें उन्मुक्त,स्वछन्द ,स्वतंत्र और एक बुध्हिजिवी (सामाजिक) प्राणी बनाया था ......लेकिन सबसे पहले सभ्यता फिर संस्कृति और फिर संस्कार के धागे बनाये गए और फिर धर्म के नाम के कपड़ों से हम सजीव कठपुतलियों को सजाकर समाज नामक संस्था ने अपना शो तैयार किया , राजनीति ने कहानी गढ़ी और सरकार ने मंच सजाया .
और लीजिये साहब ! हम सब नाचना शुरू कर चुके हैं और एक के बाद एक अनवरत शो कर रहें हैं .
कभी मनोरंजक , कभी उबाऊ ,कभी घिनोनी , कभी मनभावन अलग-अलग प्रस्तुती पर बहुत ही कम हमारे मन की हैं ..होगी भी कैसेआखिर कहानीकार और निर्माता भी इसी व्यवस्था यानि इसी शो का हिस्सा हैं स्वतंत्र राय तो उनकी भी नहीं है ...
चलिए चलने देते हैं ...कुछ अलग की सम्भावना व्यर्थ है ...'तमाशा ' यूँ ही चलेगा
आज के लिए बस इतना ही...
अपना ध्यान रखियेगा ...

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