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तमाशा ( THE PUPPET SHOW)

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों, आज टी.वी.पर यूँ ही अचानक बहुत दिन बाद ' कठपुतली' का नाच देखा तो ऐसा लगा मानो बचपन की यादों की संदूकची से कोई पुरानी ख़ूबसूरत सी मनपसन्द चीज हाथ लग गयी हो . 'कठपुतली ' कितनी मनोरंजक होती है ना ! पर शायद तब तक जब तक एक निर्जीव गुडिया है ...पर अगर वास्तविक दुनिया पर नज़र डालें तो पाएंगे की सजीव गुडिया भी हैं आस-पास . बाबाजिओं के डेरों में , कॉर्पोरेट ऑफिस आदि में ....धर्मान्धता /अन्धविश्वास , नियमों के धागों से बंधी कठपुतलियां , घड़ी की सुइयों के इशारे पर नाचती कठपुतलियां , घर-परिवार की जरूरतों को पूरा करने में खटती कठपुतलियां , राजनीति के दाँव पेचों के धागों से लटकती , सरकार के नियमों पर कमर मटकाती , कूद-कूद कर हाथ नचा नचा कर उम्मीद के इशारों पर नाचती रंग-बिरंगी , सुंदर और शरारती भांति-भांति की कठपुतलियां ...दलों के सदस्यों के रूप में गुंडा-गर्दी का खेल दिखाती , ईश्वर के नाम पर कहानी गढ़ कर लोगों को गुमराह करती ...बेरोजगारी , अशिक्षा , अवसरों की कमी , निर्रथक पढाई के बोझ से दबी , समाज के जात-पात , आरक्षण और ऊँच-नीच के भेद-भाव का शिकार 'कठ...

Excuse me ! (माफ़ करियेगा)

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , मेल-मुलाकातों , शादी - ब्याहों और दावतों का मौसम पूरे शबाब पर है ...अल्ल्लाह के फज़ल से (भगवान की कृपा से ) कुछ दावतों का invitation भी नसीब हुआ है . कार्ड इंग्लिश और  हिंदी अलग-अलग भाषाओँ में मिले ...पर कुछ निमंत्रण पत्रों में सौभाग्यवती और आयुष्मान को इंग्लिश में पढ़कर वो फीलिंग नहीं आई जो हिंदी में आती है ...इसे मेरा old fashioned होना माना जा सकता है, वैसे मैं नए तरीकों को अपनाने के प्रति खुली सोच रखती हूँ और whatsapp पर अपने सन्देश इंग्लिश वाले अक्षरों में हिंदी में ही लिख भी लेती हूँ , फिर भी जो मजा अपने blog में हिंदी लिखकर आपसे जुड़ने में आता है वो मैं ही समझ सकती हूँ ( वो बात अलग है कि इस हिंदी के चलते ही मैं बहुत सारे लोगो को अपने blog और facebook page से जोड़ नहीं पाई हूँ )....सोशल मीडिया जो कि आजकल संपर्क और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है ...वो भी 90% अंग्रेजी भाषी है ...पिछले दिनों एक दावत में बहुत सारे बेहतरीन कपड़ों , सजे चेहरों से रूबरू हुयी , कुछ सादा और संजीदा चेहरों ने ध्यान खींचा ...एक ग्रुप college going , अंग्रेजी भाषी , सुघढ़ शरीर व...

फितरत !

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , चन्द लाइन आपकी नज़र ... '' कितनी अजीब है इंसान की फितरत ,     हर अच्छी बुरी बात कुछ दिन में बन जाती है आदत ! चेहरा छुपाना पहले शौक बना ...अब प्रदुषण ने मजबूरी में तब्दील कर दिया , पहले जो महज़ औरतों का था शगल ..पर अब तो मर्द भी ढकतें  हैं शकल,     क्योंकि फितरत तो न हम बदलेंगे ना ही हवा   हम उसे गन्दा करेंगे और वो हमें  ...     और फिर यूँ जीना हमारी आदत बन जाएगी .... पानी को ही लीजिये , अपनी फितरत के चलते हम इसे बर्बाद करतें हैं और मौका मिलने पर वो हमें ...और अब ऐसे ही जीने की आदत बन गयी है ... धर्म को ही देखिये ..हम उसका दुरूपयोग कर रहें हैं और वो हमारा , फितरत है सो सुधार हम नहीं लायेंगे ...फिर चाहे धर्म की खातिर फ़ना हो जायेगें क्या फर्क पड़ता है ऐसे ही जीना आदत बनती जा रही है ... पर इंसान का क्या ??? वो अपने ही जैसो पर किसलिए जुल्म ढाता है ?? क्यों हर समाचार अधर्म , कुकर्म , अन्याय , गुस्से , शोषण की ही गाथा गाता है ???      कैसी है ये फितरत जो दिनों-दिन आदत से ज्यादा जूनून...

आखिर धर्म ही क्यों ?

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 प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , अभी-अभी समाचारों में राफिया नाज़ , योग शिक्षक को लेकर ताज़ा - तरीन बहस को सुनते हुए मन अजीब से ख्यालों से भर गया ...कहा जा रहा है कि राफिया को योग छोड़ने की नसीहतें दी जा रही हैं, उनके धर्म के मुखियाओं की तरफ से ...शायद इसे एक शारीरिक क्रिया न मान कर किसी धर्म से जोड़ा जा रहा है ... क्या मानना है आपका ?? ये तैराकी को किस धर्म की तरफ रखना चाहेंगें आप ?? शूटिंग ( निशाने बाजी ) किस की तरफ जाएगी ?? ईमानदारी से सोचियेगा क्योकिं तब आप पाएंगे कि हमारे-तुम्हारे की शाखाएं बहुत गहरे कहीं हम सब के फायदों की जड़ों से निकली हैं ...और इन जड़ों  को  पाला-पोसा जाता है निजीस्वार्थ की खातिर . मेरी तरह शायद आपने भी ये गौर किया हो कि हमारे समाज में बहुत से ऐसे काम-धंधें है जिन में किसी धर्म विशेष का वर्चस्व है, लेकिन उन की उपयोगिता और मिलने वाले फायदे हर तबके और धर्म के लिए हैं . ऐसा क्या - क्या है जिसको हम सिर्फ धर्म के आधार पर बाँट सकते हैं  ?? सोचिये आजकल अस्पतालों में खून खरीदा नहीं जाता , खून के बदले खून दिया जाता है ...क्या उस खून के धर्म की जांच होत...

'' कभी जवाब ...कभी पहेली ''

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , चंद लाइने आपकी नज़र हैं ....                                                                       '' कभी जवाब ...कभी पहेली ''     जिंदगी थोड़ी अजीब है ....सबके पास है पर कुछ के ही करीब है ...    माँ के पास है पर ...माँ की गोद के दूध मुहें बच्चे के करीब है,    पढ़ते हुए बच्चे के पास है पर ...ड्राइंग करते बच्चे के करीब है,    पापा के पास भी है पर ...क्रिकेट देखते पापा के करीब है,   दादी के पास है पर ...मिठाई  खाती दादी के करीब है, जिंदगी थोड़ी अजीब है....कुछ की है दोस्त तो कुछ की रकीब है... कार  में बैठे बच्चे की है दोस्त तो..... बाहर से हाथ बढ़ाकर भीख मांगते बच्चे की रकीब है, करोडपती कारोबारी की है दोस्त तो ...क़र्ज़ के लिए जान पर देने वाले किसान की रकीब है, मंदिर में गुप्त दान करते भक्त की है दोस्त तो ...बाहर प्रसाद के ...

यूँ ही ( जिन्दगी )

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , .................................. इतेफाकन आज एक शख्स को देखकर यूँ ही कुछ लाइनें दिमाग में तैर गयीं तो उन्हें कागज़ पर हर्फों की शक्ल दे डाली ....पसंद आये तो बताईयेगा जरूर ...                                                                     ' रंग - चेहरों के '         ''  नारंगी , नीला , पीला ....हरा                रगों के जैसा ही होता है हर चेहरा ....हरेक अपने में खास, हरेक अपने में अलग           सूने , मुस्काते ,तपते ,उंघते ,उकताते ,चमकदार और भी न जाने कितने प्रकार                 जीवन के हर पहलू से जुड़े चेहरे , सब अपने में खास.... सब अपने में अलग           तीखे , मुलायम , सुर्ख , सर्द , सख्त ,ज़र्द ,मखमली और भी कई जज्बातों ...

सोच ( अपनी-अपनी )

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , विगत दिवाली की शुभकामनायें ...यूँ भी देश के कुछ प्रान्तों में तो दिवाली आगामी एकादशी तक मनाई जाती है ..दिए और रोशनियाँ जलाकर , खैर चलिए शुभकामनायें तो शुभ की कामना से ही दी जाती हैं तो इतने विस्तार की जरूरत नही है ... इस बार की दिवाली घर से बाहर दोस्तों , रिश्तेदारों के साथ मिलकर मनाने का अवसर मिला ...मिला इसलिए कि हमारी परम्परागत सोच तो हमे दिवाली अपने घर की ही करने की प्रेरणा देती है लेकिन कुछ कारण ऐसे बने की जाना जरूरी हो गया और ये नया अनुभव हाथ लगा ...कि अपनों से मिलना ,समय साथ गुजारना ,लीक से हट के भी त्यौहार मनाना कभी-कभी सुखद होता है . इतेफाक से देश की राजधानी में दिवाली की रात गुजारी ...जहाँ आतिशबाजी बेचने पर सरकारी रोक थी ...और उसी वजह से उम्मीद थी की पटाखों की कर्णभेदी ध्वनि और उनसे निकलने वाला घोर प्रदूश्नकारी काला धुंआ भी नहीं झेलना पड़ेगा ....पर अफ़सोस लाख प्रगतिशील होने , आधुनिक लोगों से भरा होने के बावजूद ये शहर भी उन आम शहरों की तरह ही पेश आया जो की छोटे और पिछड़े माने जाते हैं ..यानि की पटाखे चले और( इस बात पर कि रोक क्यों लगायी गय...

Career or Character ???

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    प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , आपने भी जरूर सुना होगा ...ठीक से , ध्यान से पढाई कर ले बेटा बड़े होकर 'बड़ा आदमी' बनना है...पर हम ऐसा कम ही सुनते हैं कि पढ़-लिख ले बेटा बड़ा होकर ' अच्छा आदमी' बनना है  ...व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए अच्छा इंसान होना बड़ा इन्सान होने से कहीं ज्यादा जरूरी है .... चाहे चंडीगढ़ का बड़े बाप के बेटे का महिला से छेड़-छाड़ करना ले लीजिये या विजय माल्या का चार सौ बीसी कर देश से पलायन या बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में महिलाओं से दुर्व्यहवार या फिर धर्म के नाम पर बड़े-बड़े धर्माधिकारियों के द्वारा महिला -अनुयायियों का शोषण या फिल्मो से जुड़े नामी -गिरामी व्यक्तियों का कास्टिंग काउच हो या देश के घोटालों के मास्टर-माइंडस ....ऐसे अनगिनत मामलें है जो तथाकथित बड़े आदमियों द्वारा अंजाम दिए गए हैं ... जाने - माने कालेजों से शिक्षा प्राप्त , समाज के उच्च वर्ग के वो पुरुष(स्त्रियां शिकार ज्यादा और शिकारी कम ही हैं , इस कारण उल्लेखनीय नहीं हैं यहाँ ) जिन्होंने माँ-बाप के अनुसार बड़े आदमी का तमगा तो माथे पे  लगा लिया पर शायद अच्छा आदमी बनने में कुछ चूक गए  .....

माहवारी ( एक कष्ट-चक्र )

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों ,  सबसे पहले तो आभार प्रकट करना चाहूंगी ,अपनी घनिष्ठ मित्र का जिन्होंने whatsapp पर ये पोस्ट मुझसे शेयर किया और  कृतज्ञता जाहिर करना चाहूंगी ,जो उन्होंने मुझे इस विषय पर अपने शब्दों में कुछ लिखने को कहा . ..विषय से न्याय करने की पूरी कोशिश रहेगी . सच कहूं तो सबसे पहले मुझे इस बात की ग्लानि हो रही थी कि इतनी सारी बातों  के बीच में मेरा खुद का ध्यान स्त्रियों की इस दुखद समस्या पर क्यों नहीं गया ..... माहवारी / मासिक धर्म ..हर स्त्री के जीवन में घटित होने वाली नैसर्गिक प्रक्रिया ..सही कहा जाये तो प्रकृति के उन कष्टदायक उपहारों में से एक ,जो सिर्फ स्त्रियों को ही बांटे गए हैं...इसका वर्ग , धर्म ,जात-पात को लेकर कोई विभाजन नहीं है ...पर कितना भयावह है इस मासिक चक्र का हर महीने ४-५ दिन सामना करना विशेषकर उनके लिए जो दो वक़्त के खाने तो क्या ठीक से तन ढकने लायक कपड़ों के भी मोहताज़ हैं . दो बार घर पर काम करने वाली और मजदूरी करने वाली दो महिलाओं से जब सूती साडी देने पर नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली तो मैंने भी मान लिया कि सूती धोती इनके काम , रहन - सहन ...

साक्षर या शिक्षित

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , आज न्यूज़ पेपर में साक्षरता के बारें में पढ़ते-पढ़ते अनायास ही मन में एक सवाल कौंधा ....कि क्या अंतर है साक्षर और शिक्षित होने में ...आप में से यक़ीनन बहुत से लोग मेरी बात का अर्थ समझ गए होंगे ...जी हाँ ..हम साक्षरता का प्रतिशत तो बढ़ा रहें हैं पर क्या शिक्षितों की श्रेणी में आ रहे हैं ?????????? अंतर बड़ा है.... और इसे पाट पाना ही असल जीत है ...मेरे अधीनस्थ कर्मचारियों में कुछ चतुर्थ श्रेणी (4th class) भी साक्षर हैं ...और कुछ जो बेहतर ओहदों पर हैं वो साक्षर होकर भी निरक्षर समान ही कोरे कागज़ हैं ... सही समझे आप अपनी तनख्वाह या दैनिक मजदूरी कहीं पर अपना हस्ताक्षर बनाकर (या नाम ही लिखकर) लेने वाले को हम पढ़ा-लिखा (साक्षर) मानते हैं ...कुछ बेहतर सडकों पर लगे फ्लेक्स , दुकानों के बोर्ड , न्यूज़ पेपर की हैडलाइन आदि भी पढ़ लेतें हैं ...पर इनमे से ज्यादातर अपने नियोक्ता (employer) द्वारा बेवकूफ बना लिए जातें हैं ...या नेताओं द्वारा चुनावों में बरगला दिए जातें हैं ...या कार्य स्थलों पर शोषित (शारीरिक ही नहीं , क्योकिं वो तो शिक्षित भी हो जातें है ) किये जाते हैं ...य...

छाप

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों ,  कुछ दिन से आपसे बात नही हुयी , आप भी कुछ बेजार से रहे ...फिर आज मैंने सोचा कि बातचीत जारी रहनी चाहिए ..यूँ भी कहा जाता है कि बातचीत हर समस्या का समाधान है और चुप्पी रिश्तों का खात्मा ...और आपसे तो बहुत सी बातें करनी हैं आप जवाब नहीं भी देंगे तो क्या ...सुनेगें तो सही ना ..वो भी काफी है मन हल्का करने के लिए ...मेरी कोई न कोई बात तो आपके मन पर अपनी छाप छोड़ ही जाएगी ..बस साथ रहिएगा क्योंकि उसकी हम सब को जरूरत है ... छाप से याद आया की हम यानि इस विशाल देश के स्वतंत्र नागरिक छाप छोड़ने में बहुत माहिर हैं ...कुछ उदाहरनो से अपनी बात को पुख्ता करना चाहूंगी ...किसी भी ऐतिहासिक या नव निर्मित इमारत को देखिये अपना नाम खोदकर या पान थूककर या इश्तेहार चिपकाकर या भद्दे कमेंट लिखकर ....कचरे के डिब्बे के बाहर कचरा फेंककर , उसके आस-पास थूककर ....थिएटर , ट्रेन , बस , स्कूल आदि आदि की सीट के नीचे कागज़,छिलके इत्यादि फेंककर...अपनी पवित्र पूजनीय नदियों में कचरा , मूर्तियाँ , लाश , जूठन और भी जाने क्या-क्या बहाकर ..या कहिये की जहाँ कहीं भी हम होते हैं या जाते हैं अपनी छाप...

narration (कहानी आम जिंदगी की )

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एक सवाल (पुरुषों से )

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , news report  13/9/17 :- ' कौशाम्बी में आठ साल की छात्रा  को बलात्कार के बाद जिन्दा जलाया ' एक सवाल - धर्म के ठेकेदारों , राजनीतिज्ञों , धर्माधिकारियों , समाज सुधारकों , सामाजिक संगठनों / दलों के नुमाइन्दों , नियम कानून और संस्कृति के रखवालों से , ना  तो अभी कपड़े पहने होंगे छोटे और तंग , ना अभी किया होगा बॉय फ्रेंड का संग , ना अभी आधुनिकता का चढ़ा होगा रंग , न ही पाश्चात्य संस्कृति के अपनाये होंगे ढंग , फिर हे श्रेष्ठ , आदर्श , ज्ञानी , सर्वज्ञ , सभ्य , सुसंस्कृत , धर्म परायण पुरुषों कृपया इस प्रश्न का दें हल कि  '' ऐसा क्या किया होगा आठ साल की बालिका न जिससे बलात्कारी की इच्छाओं को मिला होगा  बल ''?????? निश्चित ही अब एक नया लांछन लगाया जायेगा ...कन्या रूप में योनि के साथ जन्म लेना ही इसका कारण बताया जायेगा ! स्त्री जननी है , मकान को घर बनाती है , अपने खून ( दूध ) से सींचकर बालक को समाज का नागरिक बनाती है, सफल पुरुष के पीछे महिला का हाथ होता है ....एक विशेष बात और ...औरत कमजोर , नीच , घिनौने , नामर्द , दुष्कर्मी पुरु...

सारा रा रा

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों ,  एक छोटी सी कोशिश की है आपके जज्बातों को जगाने , देश की वर्तमान स्तिथी दिखाने और आपको अपने एक अलग प्रयास से जोड़ने की ....शायद आप पसंद करें ...आपके जवाब या अभिव्यक्ति का इन्तजार रहेगा ...  ''एक महिला को मिला है देश की रक्षा मंत्री का पद , ये है स्त्री जाति की सबला होने की हद . सिर्फ स्त्री के ही होते हैं नौ नौ अवतार , पुरूषों ज़ागो , आदर करो ,करो इनसे सदव्यवहार l जोगीरा सारा रारा .... गुन्दागर्दी तो ना हुई कम , कम हुए गौमांस भोगी , मजनुओं में दहशत है ,जब से आये योगी . चुनाव पूर्व थी खुद जिनकी भाषा भद्दी , धुआधार कानून बनाकर ,बचा रहे अब गद्दी l जोगीरा सारा रारा ... राम - रहीम हो , या हो आशा- राम  जनता ने कर दिया ,सबका काम तमाम , बापों को तो मिल गया , पूरा पूरा ग्यान अब माँ पर भी चाहिए , न्यायालय का ध्यान जोगीरा सारा रारा .... खूब सुनाये भाषण , खूब दिखाया नाच बड़े उत्साह से मनाया , शिक्षक दिवस आज , कल कक्षा में फिर , दिखायेंगे अपने रंग शिक्षकों का चूर करेंगे सारा घमंड जोगीरा सारा रारा ... बाबाओं की भर दी झोली खाली ,...

बचपन ( यादों का गलियारा )

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , अपना बचपन साझा कर रही हूँ आज आपके साथ ....देखते हैं कहीं दिल के तार और ज़ज्बात जुड़ते हैं क्या हमारे बीच...                                     ' बचपन '  बचपन  गुजर जाता है , नही बीत जाता है ...... गुजर तो माँ बाप जाते हैं , वो लौट के जो नही आते हैं बचपन तो जाता ही नही है , अक्सर ही झांकता है मन के उस कोने से , ज़िसे हम उम्र के परदे से ढक कर रखते हैं बचपन झांकता है , गली के बच्चो के शोर से, गिफ्ट की दुकान से , रंग बिरंगे खिलौनो से छोटी क्लास की किताबों से , राखी के धागो से आकाश में उड़ती पतंगों से , पुरानी फोटो अलबम से बचपन मेरा भी था ...बचपन मुझमें अभी भी ज़िंदा है सालता है , दुलारता है , रूलाता और पूचकारता भी है भाई की फ़ोन कॉल से , पुरानी चिटठीयों के अक्षरों से बेटे के मुझे माँ कहने से , माँ की दी आदतों से , पापा की पुरानी घडी से ...मेरा बचपन ... जो बीत गया है सालों पहले.... Boost post

आवरण / कवच

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों ,  इस बड़ी सी दुनिया में लम्बा अरसा गुजारने, बहुत सी जिम्मेदारियां सँभालने और ऊंची - ऊंची पदवियां हासिल करने के बावजूद भी माँ-बाप की नज़र में हम और हमारा वजूद छोटे बच्चे जैसा ही रहता है.... कितना कुछ है जो हम उनसे कभी न पूछते हैं और ना वो हम पर जाहिर करते हैं ...वो एक छाया की तरह हैं या कि एक खोल... जो हमे ढक लेता है ...आराम देता है ...उसके हटने और बाहर की तपन , चुभन और दिक्कतों से सामना होने पर ही उस (आवरण / कवच) की कमी का एहसास और जरूरत समझ आती है ...माँ-पापा के नाम चंद लाइने मेरी कलम से ....                                           'मरीज़ माँ ' ''माँ मरीज़ थी मेरी ......अपने या मेरे बचपन से ....नहीं पता माँ मरीज़ थी ...बाज़ार नही जाती थी , घर के कामों में ही सर खपाती थी माँ मरीज़ थी ...पर घर कांच सा चमकती थी और मुझे अपने हाथ के सिये कपड़े पहनाती थी माँ मरीज़ थी ...रात -रात को उठकर लम्बी सांस को तरसती और अपनी उखड़ती सांसो को बांधने की  जद्दोजहद...

SELFIE ' जरूरत या जूनून '

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , आज जब आप लोगों की तरफ से मिलने वाली तवज्जो को जांचा तो लगा कि शायद कहीं कुछ है जो आपकी उम्मीदों पर पूरा नहीं उतर रहा ....या कि आपके मन-मुताबिक नहीं है ...फिर सोचा बातचीत जारी रखतें हैं , कभी , कहीं , कोई बात तो जरूर आपकी पसंद पर पूरी उतरेगी ... आज के दौर में जब आपसे जुड़ने का साधन भी ये इन्टरनेट और मोबाइल फोन ही है, तो इस मोबाइल की खासियतों में से सबसे ज्यादा नाम कमाने वाली एक खासियत ' सेल्फी ' की बात करते हैं ...आज टी.वी . पर अपने एक केन्द्रीय मंत्री को जनता से अपनी सुरक्षा और परिवार के नाम पर इस 'सेल्फी के बुखार ' से दूर रहने की अपील करते देख कर फिर एक बार तरस हो आया अपनी प्रजाति पर , अपने देशवासियों के भोलेपन पर जहाँ हर दुसरे दिन अलग-अलग वजहों के लिए मसलन ....हेलमेट लगाने , नदी - नाले साफ़ रखने , कचरा न फ़ैलाने , शौचालय बनवाने , लड़कियों को माँ के पेट में ही ना मरने , खैनी-गुटखा न खाने ,बाल- मजदूरी न कराने , हाथ धोने , साफ़ रहने और आज की ज्वलंत अपील ' सड़कों, नदी, समुद्र . पहाड़ और असुरक्षित जगहों पर 'सेल्फी' न खीचने की गुजारिश...

blue whale challenge हिम्मत नहीं बुजदिली ...

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , आज विशेष तौर पर उन साहसी , जाबांज और एडवेंचरस लोगो से मुखातिब हूँ जो  चुनौतियों का सामना करना दिलेरी का काम समझतें है .. . पर बदकिस्मती से ये चुनौतियाँ ( किसी परोपकार के काम की , किसी गाँव में बाढ़ पीड़ितों की मदद की , किसी अबला की इज्जत बचाने की , किसी पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाने या के समाज में कोई सापेक्ष (पॉजिटिव ) बदलाव लाने की  , अपने स्कूल के विषयों पर कोई नया प्रोजेक्ट बनाने की या पब्लिक में माइक पर एक जोरदार भाषण देने की  नहीं हैं ) ... ये हैं माँ -बाप से छुपकर सिगरेट पीने की , किसी लड़की का दोस्तों के कहने पर पीछा करने की , चोरी से मोबाइल पर गन्दी वीडियो देखने की , किसी लड़की का गलत विडियो बना कर उसे ब्लैकमेल करने की , टीचर को धमकाने की , डुप्लीकेट पेपर निकलवाने की , घर से पैसे गायब करने या फिर घर में झूठ बोलकर दोस्तों के साथ मस्ती करने की ..... पर मेरी जानकारी में ये वो लोग हैं जिन्हें बलि का बकरा बनाने के लिए लोग तैयार बैठे हैं , ये वो लोग हैं जो कमजोर हैं , ये वो लोग भी हैं जिन्हें अपने सही-गलत की समझ ही नहीं है , ये ...

लानत है...

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों , कुछ लानतें भेज रही हूँ , हर उस बात के लिए जिसने हमारे समाज को शर्मिंदा किया है ...वो बातें जो हमारे मतलबी , दिखावटी , ढोंगी और गैर-जिम्मेदार होने के सबूत हैं ... हमारे असंवेदनशील होने का प्रमाण हैं .. ' ' लानत है ....... किसी की मजबूरी का अपने फायदे में इस्तेमाल करने वाले , शख्स के ....इंसान होने पर लानत है .... धर्म , जाति के नाम और  इंसानों की मौत पर सियासत करने वाले ,नेता के ....ओहदे पर लानत है ...  पैसे और जल्दी नाम कमाने के लिए मरीजों से खिलवाड़ करने वाले ,डाक्टर के ...पेशे पर लानत है .... झूठे गवाह ,दस्तावेजों में फेर-बदल कर गलत को सही साबित करने , वकील के .... नाम पर लानत है .... गरीबों को सड़क पर कुचल कर भी सजा न पाने वाले , सुपर स्टार की ....शोहरत पर लानत है ... स्कूल में ना पढाकर , जबरन कोचिंग बुलाकर पैसे कमाने वाले , टीचर की ... मंशा पर लानत है ... ससुराल से पैसों की मदद और उपहारों की मांग करके उनकी नुमाइश करने वाले , लड़के की ....मर्दानगी पर लानत है .... किसी की आस्था और विश्वास का सहारा लेकर उसे अन्धविश्वास में...

धर्म या अधर्म (आप बताएं )

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प्यार भरा नमस्कार दोस्तों, हाहाकार मचा है देश में ....धर्म की लकीर बीच में है ...एक ओर हैं धर्म के नाम पर व्यापार चलाने वाले बाबा के अन्धविश्वासी अराजक भक्त हैं ...तो दूसरी ओर हैं वो लोग जो वास्तविकता और विकास के पक्षधर हैं . मैं यदि नास्तिक नहीं हूँ तो बहुत नेम-धरम वाली आस्तिक भी नहीं कहलाई जा सकती ... मैं मंदिर नहीं जाती , पूजा भी ठीक से नहीं करना जानती , मैं व्रत भी गिने - चुने और अपनी सुविधा से ही करती हूँ . मैं किसी मामले में आदर्श महिला नहीं हूँ .लेकिन मैं अपना काम पूजा की तरह ही करती हूँ , मैं किसी क्लब या किटी की सदस्या भी नहीं हूँ ( अक्सर ऐसे सदस्यों को मैंने सामाजिक रूप से अति दानशील और अख़बारों की सुर्ख़ियों में , फोटोज में देखा है पर निजी जीवन में घरेलू नौकरों या इनके प्रतिष्ठानों में काम करने वालों के प्रति ये असंवेदनशील और शोषण का ही भाव रखतें हैं / ये सब पर लागू नहीं होता है  ) यक़ीनन मैं अपने पर इस बात का गर्व कर सकती हूँ कि मैं किसी का दिल नहीं दुखाती और किसी को दुखी देखकर मेरा मन दुखता है , मैं भजन - आरती नहीं गाती ( वैसे मैं जानती हूँ और कीर्तन में गाती भी ...